Monday, April 26, 2010

कलियुग की रामकहानी

कौन सुनेगा
किसे सुनाऊं
इस कलियुग की रामकहानी
नर - नारी मशीन की छाँव
धरा -धाम पर धरें ना पाँव
चाँद सितारों तक जा पहुँचे
जपते जपते नीर का नाँव
कल के अचरज
सभी गिनाऊँ
रखना मुश्किल याद जबानी
अम्मा के हाथों की रोटी
सालन चटनी लगती खोटी
बाज़ारों की सड़ी गली भी
जितनी महगी उतनी मीठी
रेशम -रिश्ते
हुए उबाऊ
अपनेपन की लटी निशानी
चलता है अब सिक्का खोटा
शुद्ध हवा पानी का टोटा
वैश्वीकरण बाजारबाद नित
इधर उधर भाँजें सोंटा
किसको कैसे
गीत सिखाऊँ
अधर अधर पर खर -स्वर -पानी
[भोपाल:२६.०४.२०१०]




Thursday, April 15, 2010

आतंक का साया

चील गिद्ध कौवे मंडराते
लिए कफ़न के बस्ते
टिड्डी दल बन फसल चाटते
आतंकबादिए दस्ते
पलक झपकते ही बिछ जाती
लाशों पर जब लाशें
शकसंदेहों के घेरों से
निकल न पातीं फांसें
छाई रहती है दहशतगर्दी
सुबह शाम दोपहरी
आतंकबाद के सौदागर
बुनते चादर धुन्धरी
तंत्र मन्त्र हैरान
भय का तना वितान
नींद नहीं जब आए
कैसे मन मुस्काए?

कांक्रीट के जंगल बुनते
वनंउपवन की ठठरी
पञ्च तत्व हो गए विषैले
चिंतित दुनिया सबरी
तापमान की उछलकूद से
काँप उठा भूमंडल
प्रक्रतिनटी के तेवर तीखे
लिए विनाश कमंडल
वादों के दलदल में दुनिया
भटक गई है रस्ता
वैश्वीकरण बाजारबाद से
हुई उधारी खस्ता
बर्बादी आभूषण
भ्रष्टाचार-प्रदूषण
आतंकवाद बन छाए
कैसे मन मुस्काए ?



Tuesday, April 6, 2010

बेटा

सड़क किनारे लेटा है
नंग -धडंगा लेटा है
लगता मनमानी पीकर
bhookheen saansen letaa hai
मजबूरी पागलपन का
परिचय जग को देता है
सब संवेदनहीन हुए
नोटिस कोइ न लेता है
भूल गए हम सब कैसे
भारत माँ का बेटा है
[भोपाल:०५.०४.२०१०]

Tuesday, January 5, 2010

नये वर्ष की नई धूप

नए वर्ष की नई धूप में सबको साथ नहाना
गाँव शहर क बीच विषमता की दीवारें
गाँव शहर के बीच अडीं हैं ऊंची मीनारें
अर्थ विकास विषमता का विष घोल रहा
अर्थ तंत्र सारे गाँव का डोल रहा
अब विकास के समीकरण को नया बनाना होगा
नए वर्ष की धूप में सबको साथ नहाना होगा
आतंकवाद भ्रष्‍टाचारों में सारा जग पलता
आये दिन चौराहों पर जिन्‍दा जीवन जलता
भूखा पेट हाथ खाली हैं मन में युद्ध मचलाता
दुनिया का भविष्‍य खतरों के पंजों में जकड़ा लगता
मानव को सच्‍च्‍े जीवन का पाठ पढ़ाना होगा
नये वर्ष की नई धूप में सबको साथ नहाना होगा
प्रकृति साधनों का अति दोहन खतरा उगल रहा
भीड़ भाड़ वाहन कोलाहल शांति निगल रहा
गंगा यमुना नील वोल्‍गा का जल हुआ विषैला
धुआं उगलता विष जहरीला जो चिमनी से फैला
विषम प्रदूषण की ज्‍वाला को आज बुझाना होगा
नये वर्ष की नई धूप में सबको साथ नहाना होगा।

Wednesday, October 14, 2009

तीज और त्यौहार

घर में गेहूं हों जहाँ ,मनता है त्यौहार
भूंजी भांग न हो जहां ,कैसे हो व्यवहार
कैसे हो व्यवहार ,नचे कैसे खुशहाली
जगर मगर हों दींप ,मने कैसे दीवाली
अधरों pr हो हास ,उमंगें हों तन मन में
समता का हो राज़ बटे धन बल घर घर में
दीवाली के दियोंका ,रूप रंग आकार

देख देख मन मगन हो ,ज्यों साकार
प्रेम एकता त्याग ,सबकी है धुंधली धूप
चालाकी षड्यंत्र ,करते है खूब जुगाली
जगर मगर बाज़ार ,मने उनकी दीवाली

तीज और त्यौहार की ,मूल भावना भंग
वैश्वीकरण बाज़ार की ,सबने पी ली भंग
सबने पी ली भंग ,किसी को हिश नहीं है
संस्कृति धर्म उदास ,अरे अफ़सोस नहीं है
पुरखे यदि आ जायं जब गाँव शहर गलियार
भौचक्के रह जाय ,लख तीज और त्यौहार


Friday, July 3, 2009

दो कुण्डलियाँ : फटी कमीज़

फुर्सत सिलने की कहाँ,जिनकी फटी कमीज़
बंधुआं मजदूरी उन्हें ,सौपे रोज तमीज़
सौपे रोज़ तमीज़ ,नहीं कुछ उनकी हस्ती
बहता उनका खून,उडाते मालिक मस्ती
भोग सकें आनंद ,नहीं जुट पाती जुर्रत
मजदूरी जंजाल कहाँ मिल पाती फुर्सत

मजबूरी में फैलते, सचमुच दोनों हाथ
जब मजबूरी जकड़ ले,कोई ना दे साथ
कोई ना दे साथ ,सभी कर जायं किनारा
भाई बांधव पूत ,जलाएं चूल्हा न्यारा
तन की फटी कमीज़ ,बढ़ाती मन की दूरी
साथ ण दे आनंद ,झेलना दुःख मजबूरी
[भोपाल:०४.०७.०९]